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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 34

पिया बिनु, प्यारी होति अधीर।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piyā binu, pyārī hoti adhīra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1पिया बिनु, प्यारी होति अधीर।

2"पिवु पिवु, रटति अटति ब्रज-वीथिन, घटत न दृग घट-नीर।

3तरु-तमाल-श्यामल लखि श्यामा, श्याममई भइँ वीर।

4लखन शिखिन, शिखि-पुच्छ-मुकुट सुधि, होति बढ़ति उर-पीर।

5करि करि सुरति विहार निकुंजनि, मुर्छित कुंज-कुटीर।

6निशि “कृपालु” लखि चक्रवाक कहँ, कछुक धरत उर धीर॥

हिन्दी भावार्थ

प्यारे श्यामसुन्दर के वियोग में विरहिणी राधिका अत्यन्त ही व्याकुल हो रही हैं। 'पिवु पिवु' की रटना लगाती हुई, ब्रज की गली-गली में उन्हें ढूँढ़ती हुई, आँखों से निरन्तर ही अश्रुधारा बहाती हैं। श्याम रंग के तमाल वृक्षों को देखकर किशोरी जी श्यामसुन्दर का स्मरण करती हुई तन्मय हो जाती हैं। मयूरों को देखते ही मोरपंख वाले श्यामसुन्दर का स्मरण करती हुई और भी अधीर हो जाती हैं। प्रियतम के साथ किये हुए पूर्व निकुँज-विहार का स्मरण करती हुई मूर्च्छित हो जाती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि रात्रि में चकवा-चकवी पक्षी को देखकर (चकवा-चकवी रात्रि भर स्वाभाविक ही एक-दूसरे से वियुक्त रहते हैं) किसी प्रकार थोड़ा-सा धैर्य धारण करती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 649-650