# पिया बिनु, प्यारी होति अधीर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0687-M16-K034
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 34
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 323–323

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पिया बिनु, प्यारी होति अधीर।  
<a id="line-2"></a>"पिवु पिवु, रटति अटति ब्रज-वीथिन, घटत न दृग घट-नीर।  
<a id="line-3"></a>तरु-तमाल-श्यामल लखि श्यामा, श्याममई भइँ वीर।  
<a id="line-4"></a>लखन शिखिन, शिखि-पुच्छ-मुकुट सुधि, होति बढ़ति उर-पीर।  
<a id="line-5"></a>करि करि सुरति विहार निकुंजनि, मुर्छित कुंज-कुटीर।  
<a id="line-6"></a>निशि “कृपालु” लखि चक्रवाक कहँ, कछुक धरत उर धीर॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्यारे श्यामसुन्दर के वियोग में विरहिणी राधिका अत्यन्त ही व्याकुल हो रही हैं। 'पिवु पिवु' की रटना लगाती हुई, ब्रज की गली-गली में उन्हें ढूँढ़ती हुई, आँखों से निरन्तर ही अश्रुधारा बहाती हैं। श्याम रंग के तमाल वृक्षों को देखकर किशोरी जी श्यामसुन्दर का स्मरण करती हुई तन्मय हो जाती हैं। मयूरों को देखते ही मोरपंख वाले श्यामसुन्दर का स्मरण करती हुई और भी अधीर हो जाती हैं। प्रियतम के साथ किये हुए पूर्व निकुँज-विहार का स्मरण करती हुई मूर्च्छित हो जाती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि रात्रि में चकवा-चकवी पक्षी को देखकर (चकवा-चकवी रात्रि भर स्वाभाविक ही एक-दूसरे से वियुक्त रहते हैं) किसी प्रकार थोड़ा-सा धैर्य धारण करती हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 649-650

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
