मान-माधुरी · पद 33
कुँवरि बिनु, कुँवर न उर धर धीर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari binu, kuṁvara na ura dhara dhīra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि बिनु, कुँवर न उर धर धीर।
2कबहुँक पंथ निहारत ठाढ़ो, मंजुल कुंज-कुटीर।
3कबहुँक नखन लिखत कछु मेदिनि, नैनन बरसत नीर।
4कबहुँक देखि चरन-चिह्नन महँ, धरत शीश तहँ वीर!।
5कबहुँक"हाय! हाय!"कहि निकसत, दीरघ-श्वास समीर।
6कबहुँक उठि इत उत को भाजत, विह्वल प्रेम-अधीर।
7होत “कृपालु” कबहुँ पुनि मुर्छित, सुंदर श्याम शरीर॥
हिन्दी भावार्थ
(लाडली जी के वियोग में लाल जी का विलाप!) जी के बिना श्यामसुन्दर के हृदय में थोड़ा भी धीरज नहीं बँध रहा है। कभी तो वे मनोहर कुंज-भवनों में खड़े होकर किशोरी जी की बाट जोहते हैं। कभी आँखों से आँसू नहाते हुए अपने नखों से पृथ्वी पर कुछ लिखते हैं। कभी किशोरी जी के चरणकमलों के चिह्न को देखकर उन पर अपना सिर रखते हैं एवं उसे चूमते हैं और आँसू बहाते हैं। कभी हाय! हाय!! कह कर लम्बी-लम्बी साँसें लेते हैं। कभी अत्यन्त व्याकुल होकर, उठकर इधर-उधर पागल की भाँति भागते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि कभी मूर्च्छित होकर श्यामसुन्दर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 648-649