# कुँवरि बिनु, कुँवर न उर धर धीर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0686-M16-K033
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 33
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 322–323

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कुँवरि बिनु, कुँवर न उर धर धीर।  
<a id="line-2"></a>कबहुँक पंथ निहारत ठाढ़ो, मंजुल कुंज-कुटीर।  
<a id="line-3"></a>कबहुँक नखन लिखत कछु मेदिनि, नैनन बरसत नीर।  
<a id="line-4"></a>कबहुँक देखि चरन-चिह्नन महँ, धरत शीश तहँ वीर!।  
<a id="line-5"></a>कबहुँक"हाय! हाय!"कहि निकसत, दीरघ-श्वास समीर।  
<a id="line-6"></a>कबहुँक उठि इत उत को भाजत, विह्वल प्रेम-अधीर।  
<a id="line-7"></a>होत “कृपालु” कबहुँ पुनि मुर्छित, सुंदर श्याम शरीर॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(लाडली जी के वियोग में लाल जी का विलाप!) जी के बिना श्यामसुन्दर के हृदय में थोड़ा भी धीरज नहीं बँध रहा है। कभी तो वे मनोहर कुंज-भवनों में खड़े होकर किशोरी जी की बाट जोहते हैं। कभी आँखों से आँसू नहाते हुए अपने नखों से पृथ्वी पर कुछ लिखते हैं। कभी किशोरी जी के चरणकमलों के चिह्न को देखकर उन पर अपना सिर रखते हैं एवं उसे चूमते हैं और आँसू बहाते हैं। कभी हाय! हाय!! कह कर लम्बी-लम्बी साँसें लेते हैं। कभी अत्यन्त व्याकुल होकर, उठकर इधर-उधर पागल की भाँति भागते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि कभी मूर्च्छित होकर श्यामसुन्दर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 648-649

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
