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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 35

पिया बिनु, प्यारी जिया अकुलात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piyā binu, pyārī jiyā akulāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1पिया बिनु, प्यारी जिया अकुलात।

2मग जोहति कुंजन बिच बैठी, इत उत चितवत जात।

3तरु ते खगन उड़त लखि सोचति,"आवत श्यामल गात"।

4कछु पल परखि"हाय प्राणेश्वर!"कहि कहि अति बिलखात।

5ह्वै अचेत पुनि गिरति धरणि पर,"हा! हा!"शब्द सुनात।

6पुनि उठि करत बिलाप विविध विधि, नेकु न धीर बँधात।

7कह “कृपालु” हम मान अकारन, किये आपु पछितात॥

हिन्दी भावार्थ

ही व्याकुल हो रहे हैं। वे कुन्जों में बैठी हुई, प्रियतम की प्रतीक्षा करती हुई, अत्यन्त ही अधीर होकर चारों ओर देखती जाती हैं। अकारण ही वृक्ष से उडते हुए पक्षियों को देखकर उसी ओर परम व्याकुलतापूर्वक, 'प्यारे श्यामसुन्दर आ रहे हैं ऐसा समझ कर देखने लगती हैं। निराश होकर 'हा प्राणेश्वर!! विलाप करती हैं। तत्पश्चात् मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं। केवल 'हा! हा!!'का ही शब्द सुनाई पड़ता है। पुनः उठकर अत्यन्त अधीर होकर अनेक प्रकार का विलाप करती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी मन-ही मन अपने अकारण ही मान करने पर बार-बार पश्चाताप करती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 650-651