मान-माधुरी · पद 36
पिया बिनु, प्यारिहिं विरह सताय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piyā binu, pyārihiṁ biraha satāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पिया बिनु, प्यारिहिं विरह सताय।
2विरहिनि निशा निशाचरि बनि ज्यों, रही छिनहिं छिन खाय।
3तारे मनहुँ भये अंगारे, नींद सौत भइ आय।
4दक्षिण-पवन अहिन-विष लै जनु, सब तनु विष बगराय।
5बन्यो सुधाकर, मनहुँ दिवाकर, चिनगारिन बरसाय।
6विधि विपरीत “कृपालु” कुँवरि लखि, गिरी धरणि बिलखाय॥
हिन्दी भावार्थ
(प्यारे के वियोग में प्यारी को विरह-अवस्था का प्रियतम के बिना प्यारी जी को वियोग अत्यन्त ही कष्ट दे रहा है। रात्रि मानो पिशाचिनी बनकर क्षण-क्षण में खाये जा रही है। तारे अंगारे के समान जला रहे हैं। नींद भी सौत बन गई है। दक्षिण दिशा की वायु मानो मलय-गिरि पर चन्दन के वृक्षों पर लिपटे हुए सर्पों के विष को लेकर समस्त शरीर में विष फैला रही है। अमृत की किरणों को बरसाने वाला चन्द्रमा भी मानो अग्नि की चिंगारियों को बरसाने वाला सूर्य बन गया है। 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार समस्त प्रकृति-तत्वों को विपरीत देखकर किशोरी जी अत्यन्त व्याकुल होकर अचेतन अवस्था में पृथ्वी पर गिर पड़ीं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 651