मान-माधुरी · पद 27
लली बिनु, पल पल कलप लखात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalī binu, pala pala kalapa lakhāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लली बिनु, पल पल कलप लखात।
2लखि प्राणाधिक-प्यारिहिं प्यारिहिं, प्रानहुँ तजि न सकात।
3अब अइहैं, मिलिहैं, बतरैहैं, यह आशा नहिं जात।
4सुन पिक-बैन ध्यान पिक-बैनिहिं, रहि रहि जिय घबरात।
5लखत मृगन मृगनैनिहिं सुधि करि, अधिक अधिक अकुलात।
6जियत न मरत “कृपालु” कहाँ लौं, कहिये दुख की बात॥
हिन्दी भावार्थ
(लाडली जी के वियोग में लालजी का विलाप।) हाय! हाय!! मुझे किशोरी जी के बिना एक-एक क्षण कल्प के समान भारी लग रहा है। मैं किशोरी जी को प्राणों से भी अधिक प्यारी समझने के कारण प्राण नहीं छोड़ सकता। अभिप्राय यह है कि यदि प्राण छोड़ दूँगा तो प्राणाधिका किशोरी जी का दर्शन कैसे होगा? किशोरी जी अभी ही आयेंगी, मधुर मिलन का सुख प्रदान करेंगी एवं मधुर-मधुर बातें करेंगी, यह विश्वासपूर्ण आशा मेरा साथ नहीं छोड़ती। कोयल की मधुर बोली सुनकर कोयल के समान ही मधुर बोलने वाली किशोरी जी का स्मरण करते हुए मेरा हृदय और अधिक व्याकुल हो जाता है। हिरणों को देखकर हिरणों के समान नेत्रवाली किशोरी जी के बार-बार स्मरण से मैं और भी अधिक तड़पने लगता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि न तो मैं जीने ही में हूँ और न मरने ही में हूँ। अपने हृदय के दुःख की बात कहाँ तक कहूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 643-644