मान-माधुरी · पद 28
कुँवरि बिनु, अब तो रह्यो न जाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari binu, aba to rahyo na jāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि बिनु, अब तो रह्यो न जाय।
2कोटिन प्रान निछावर वापै, जो कोउ लाय मनाय।
3सुनु ललिते! तू चतुर-शिरोमणि, पुनि प्यारिहुँ मनभाय।
4याते राखि लेहु अब प्रानन, परूँ तिहारे पाय।
5"हा! हा!"खाउँ, बलैयाँ लेऊँ, तव कर जाउँ बिकाय।
6लै “कृपालु” मोहिं मोल बार इक, कुँवरि-चरन दिखराय॥
हिन्दी भावार्थ
(किशोरी जी के वियोग में प्रियतम श्यामसुन्दर गय! हाय!! किशोरी जी के बिना अब तो किसी प्रकार भी हा नहीं जाता। अरी सखियों! जो कोई किशोरी जी को मना उस पर मैं अपने करोड़ों प्राण न्यौछावर कर दूँगा। अः ललिते! सुन, तू इन कार्यों में अत्यन्त ही चतुर है तथा किशोः जी को भी अत्यन्त मनभाई है अतएव मैं तेरे पाँव पड़ता हूँ। ही मेरे निकलते हुए प्राणों को बचा ले। अरी ललिता! मैं बार बार तेरी हा हा खाता हूँ एवं बलैया लेता हूँ। कहाँ तक कहूँ तेरे हाथ सदा के लिए बिकने को भी तैयार हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे मोल लेकर केवल एक बार किशोरी जी? चरण-कमलों का दर्शन करा दे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 644-645