# कुँवरि बिनु, अब तो रह्यो न जाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0681-M16-K028
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 28
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 320–320

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कुँवरि बिनु, अब तो रह्यो न जाय।  
<a id="line-2"></a>कोटिन प्रान निछावर वापै, जो कोउ लाय मनाय।  
<a id="line-3"></a>सुनु ललिते! तू चतुर-शिरोमणि, पुनि प्यारिहुँ मनभाय।  
<a id="line-4"></a>याते राखि लेहु अब प्रानन, परूँ तिहारे पाय।  
<a id="line-5"></a>"हा! हा!"खाउँ, बलैयाँ लेऊँ, तव कर जाउँ बिकाय।  
<a id="line-6"></a>लै “कृपालु” मोहिं मोल बार इक, कुँवरि-चरन दिखराय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(किशोरी जी के वियोग में प्रियतम श्यामसुन्दर गय! हाय!! किशोरी जी के बिना अब तो किसी प्रकार भी हा नहीं जाता। अरी सखियों! जो कोई किशोरी जी को मना उस पर मैं अपने करोड़ों प्राण न्यौछावर कर दूँगा। अः ललिते! सुन, तू इन कार्यों में अत्यन्त ही चतुर है तथा किशोः जी को भी अत्यन्त मनभाई है अतएव मैं तेरे पाँव पड़ता हूँ। ही मेरे निकलते हुए प्राणों को बचा ले। अरी ललिता! मैं बार बार तेरी हा हा खाता हूँ एवं बलैया लेता हूँ। कहाँ तक कहूँ तेरे हाथ सदा के लिए बिकने को भी तैयार हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे मोल लेकर केवल एक बार किशोरी जी? चरण-कमलों का दर्शन करा दे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 644-645

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
