मान-माधुरी · पद 29
कुँवरि बिनु, पल छिन कल न परे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari binu, pala chhina kala na pare
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि बिनु, पल छिन कल न परे।
2दुसह-विरह-दावानल परि यह, तन, मन, प्रान जरे।
3पुनि पुनि ललिहिं नाम गुन गावत, नैनन नीर ढरे।
4करि करि सुरति विहार निकुंजनि, उर नहिं धीर धरे।
5"हाय! हाय! कहि मुर्छित छिति पर, गिरत लतान तरे।
6वेगि “कृपालु” ललिहिं लै आवहु, उन बिन अब न सरे॥
हिन्दी भावार्थ
(किशोरी जी के वियोग में विरही श्यामसुन्दर व हाय दैया! अब तो किशोरी जी के बिना एक क्षण लिए भी चैन नहीं पड़ता। अत्यन्त असह्य वियोग की आगि में पड़कर मेरा यह तन, मन, प्राण, सर्वस्व ही जला जा रा है। बार-बार किशोरी जी के नाम एवं गुणों को गाते हु निरन्तर ही आँसू बहाया करता हूँ। निकुंजों में किये हु लीला-विहारों का बार-बार स्मरण करके हृदय किसी प्रकार धैर्य धारण नहीं कर पाता। हाय! हाय!! कहकर ए मूर्च्छित होकर, लताओं के नीचे भूमि पर बार-बार गिर पड़ता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि अब शीघ्र ही किशोरी जी को ले आओ क्योंकि उनके बिना अब प्यारे श्यामसुन्दर का जीवित रहना अत्यन्त ही कठिन है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 645-646