मान-माधुरी · पद 30
कुँवरि बिनु, सूनो सब संसार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari binu, sūno saba sansāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि बिनु, सूनो सब संसार।
2मालावलि व्यालावलि लागत, अंबर ह्वै गये भार।
3किसलय-सेज भई जनु शूली, चंद्र मनहुँ अंगार।
4लागत बोल भयानक सखियन, यद्यपि मधुर अपार।
5उठति हूक सुनि कूक पिकन की, पवन लूक अनुहार।
6कासों कहौं “कृपालु” लली बिनु, को उर जाननिहार॥
हिन्दी भावार्थ
(किशोरी जी के वियोग में लालजी का विलाप।) किशोरी जी के बिना मुझे सारा संसार शून्य-सा प्रतीत हो रहा है। विविध पुष्पों की शीतल मालायें भी मुझे साँपों के झुण्ड के समान खाने दौड़ती हैं। पीताम्बर भी मेरे लिए अब भार स्वरूप बन गया है। नवीन, कोमल आम्र-पल्लव की शय्या भी मुझे शूली-सी भयानक लगती है और चन्द्रमा भी आग के गोले के समान जलाने वाला प्रतीत हो रहा है। सखियों के अमृत से भी मधुर मीठे बोल मुझे अत्यन्त ही भयानक लग रहे हैं। कोयल की कूक सुनकर मेरे हृदय में हूक-सी उठती है एवं शीतल मन्द, सुगन्धित वायु भी लू बनकर जला रही है। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं दुःखिया अपना दुःख किसे कहूँ। किशोरी जी के बिना दूसरा जान ही कौन सकता है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 646-647