मान-माधुरी · पद 31
कुँवरि बिनु, जनु उनमाद लखात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari binu, janu unamāda lakhāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि बिनु, जनु उनमाद लखात।
2चित्रा कह, सुनु प्रान पियारे, तोहिं लखि हौं घबरात।
3कबहुँक बनि विरही दृग अँसुवन, पोवत हार जनात।
4कबहुँक कहि"हा! राधे! राधे!", ह्वै मुर्छित गिरि जात।
5पुनि कबहुँक करि अट्टहास अति, आनँद-मद-मदमात।
6कबहुँक नाचत, गावत कबहुँक, कबहुँक काँपत गात।
7कबहुँक गहत “कृपालु” मौन पुनि, कबहुँक कछु बतरात॥
हिन्दी भावार्थ
(प्रियाजी के वियोग में प्यारे श्यामसुन्दर को उन्माद रोग की अवस्था को देखकर सखियों का उनसे कहना।) हे प्यारे श्यामसुन्दर! किशोरी जी के वियोग में तो तुम्हारी दशा उन्माद-रोगी की भाँति हो गयी है। चित्रा सखी कहती है कि हे प्राण प्यारे! तुम्हारी दशा को देखकर तो हमारा हृदय भी अत्यन्त घबरा रहा है। कभी तो तुम वियोगी बनकर आँखों से आँसुओं का हार गुँथते हो एवं कभी हा राधे! हा राधे!! कहकर अचेत होकर गिर पड़ते हो। कभी अत्यन्त ही आनन्द में विभोर होकर हँसने लगते हो कभी नाचते हो, कभी गाते हो एवं कभी तुम्हारा सारा शरीर काँपने लगता है। "कृपालु कहते हैं कि कभी तो तुम बिल्कुल ही चुप हो जाते हो तथा कभी अपने आप ही कुछ बातें करते हुए दिखाई पड़ते हो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 647