# कुँवरि बिनु, जनु उनमाद लखात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0684-M16-K031
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 31
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 321–322

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कुँवरि बिनु, जनु उनमाद लखात।  
<a id="line-2"></a>चित्रा कह, सुनु प्रान पियारे, तोहिं लखि हौं घबरात।  
<a id="line-3"></a>कबहुँक बनि विरही दृग अँसुवन, पोवत हार जनात।  
<a id="line-4"></a>कबहुँक कहि"हा! राधे! राधे!", ह्वै मुर्छित गिरि जात।  
<a id="line-5"></a>पुनि कबहुँक करि अट्टहास अति, आनँद-मद-मदमात।  
<a id="line-6"></a>कबहुँक नाचत, गावत कबहुँक, कबहुँक काँपत गात।  
<a id="line-7"></a>कबहुँक गहत “कृपालु” मौन पुनि, कबहुँक कछु बतरात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(प्रियाजी के वियोग में प्यारे श्यामसुन्दर को उन्माद रोग की अवस्था को देखकर सखियों का उनसे कहना।) हे प्यारे श्यामसुन्दर! किशोरी जी के वियोग में तो तुम्हारी दशा उन्माद-रोगी की भाँति हो गयी है। चित्रा सखी कहती है कि हे प्राण प्यारे! तुम्हारी दशा को देखकर तो हमारा हृदय भी अत्यन्त घबरा रहा है। कभी तो तुम वियोगी बनकर आँखों से आँसुओं का हार गुँथते हो एवं कभी हा राधे! हा राधे!! कहकर अचेत होकर गिर पड़ते हो। कभी अत्यन्त ही आनन्द में विभोर होकर हँसने लगते हो कभी नाचते हो, कभी गाते हो एवं कभी तुम्हारा सारा शरीर काँपने लगता है। "कृपालु कहते हैं कि कभी तो तुम बिल्कुल ही चुप हो जाते हो तथा कभी अपने आप ही कुछ बातें करते हुए दिखाई पड़ते हो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 647

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
