मान-माधुरी · पद 26
लली बिनु, सब विपरीत लखात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalī binu, saba viparīta lakhāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लली बिनु, सब विपरीत लखात।
2सखिन-समाज साज सब मो कहँ, नेकहुँ नाहिं सुहात।
3स्त्रवत सुधा सब जान सुधाकर, मोहिं अंगार जनात।
4किसलय-सेज सबन सुखदाई, मोहिं नागिनि बनि खात।
5शीतल-मंद-सुगंध पवन मोहिं, मारि मूठि सी जात।
6धुनि “कृपालु” पिक, कीर, मयूरन, वज्रपात जनु गात॥
हिन्दी भावार्थ
(श्री किशोरी जी के वियोग में प्रियतम श्यामसुन्दर किशोरी जी के बिना मुझे प्रकृति के भी समस्त तत्व उल्टे लग रहे हैं। मेरी परमप्रिय सखियों का समुदाय एवं उनके साज किंचित् भी अच्छे नहीं लगते। सारा संसार जानता है कि चन्द्रमा अमृत की किरण बरसाता है किंतु इनके बजाय मेरे लिये तो जलते हुए अंगारे ही बरसाता है। नवीन कोमल पल्लव की शय्या सभी के लिए सुखदायी होती है, किन्तु मुझे वह मानो नागिन-सी बनकर खाने दौड़ती है। ठंडी मन्द एवं सुगन्धित वायु भी मुझे मूठ-सी मार कर नितान्त ही व्याकुल बनाये रहती है। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे कोयल, तोते एव मयूरों की ध्वनि भी बज्रपात के समान कर्कश बनकर दुःख करती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 642-643