मान-माधुरी · पद 25
कुँवरि बिनु, कैसे राखूँ प्रान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari binu, kaise rākhūṁ prāna?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि बिनु, कैसे राखूँ प्रान।
2बिनु अपराध मान गहि बैठी, ताने भृकुटि-कमान।
3हौं पुनि उन बिन रहि न सकत छिन, यह उनहूँ जिय जान।
4केहि विधि धरूँ धीर मोहिं पल पल, भये कलप उनमान।
5तनु बिनु प्रान रहे कहु कैसे?, सोचहु मनहिं सुजान।
6प्राण एक तनु द्वै “कृपालु” जब, अचरज कौन महान॥
हिन्दी भावार्थ
(श्रीकिशोरी जी के वियोग में प्रियतम श्यामसुन्दर का विलाप।) मैं किशोरी जी के बिना किस प्रकार जीवित रहूँ? उन्होंने अपनी भौंहों को तानकर अकारण ही मान कर लिया है और मैं उनके बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता, इस बात को उनका हृदय भी जानता है। हाय! हाय!! मैं किस प्रकार धैर्य धारण करूँ? मुझे तो एक-एक क्षण कल्प के समान प्रतीत हो रहा है। प्राण के बिना भला शरीर कैसे रह सकता है, इस बात को भी बुद्धिमान समझ सकते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं बुद्धिमान हूँ एवं इस बात का उत्तर देता हूँ- वह यह है कि यद्यपि लोक में प्राण के बिना शरीर नहीं रह सकता तथापि जिन प्रिया-प्रियतम के दो शरीर होते हुए भी प्राण एक है, उनके लिए तो यह स्वाभाविक ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 642