मान-माधुरी · पद 24
हाय! मैं, धरूँ कौन विधि धीर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya! maiṁ, dharūṁ kauna vidhi dhīra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय! मैं, धरूँ कौन विधि धीर।
2राधे बिनु आधे पल मो कहँ, ह्वै गये युग सम वीर!
3ढूँढत थक्यों, लख्यों नहिं कतहूँ, सुंदर गौर शरीर।
4तुम बिनु कौन हमारी राधे! जानि सके उर पीर।
5दरसन हित तरसत दोउ नैनन, झर झर बरसत नीर।
6बँध्यो “कृपालु” पियारो प्यारिहिं,-प्रेम पाश जनु कीर॥
हिन्दी भावार्थ
(प्रियाजी के वियोग में प्रियतम की दुःखद अवस्थ हाय! हाय!! हे किशोरी जी! मैं तुम्हारे बिना किस प्रकार धैय धारण करूँ? हा राधे! तुम्हारे बिना मुझे आधा पल भी युग के समान प्रतीत होता है। मैं तुम्हें दूँढ़ते-दूँढ़ते थक गया किंतु तुम्हारा सुन्दर गौर-शरीर कहीं भी दिखाई नहीं पड़ा। हे प्यारी जी! तुम्हारे बिना हमारे हृदय की वेदना दूसरा कौन जान सकता है? तुम्हारे दर्शनों के निमित्त तरसती हुई हमारी आँखे झरने की तरह आँसू बरसाती रहती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि प्रियतम श्यामसुन्दर किशोरी जी के प्रेम में ऐसे बंधे हुए हैं जैसे बहेलिये के जाल में तोता फँस जाता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 641