मान-माधुरी · पद 23
हाय! मैं, कैसी करूँ जिय जाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya! maiṁ, kaisī karūṁ jiya jāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय! मैं, कैसी करूँ जिय जाय।
2हा राधे! हा प्रेम अगाधे! तुम बिनु कछु न सुहाय।
3पलक-ओट नहिं भई कबहुँ अब, गई कितै बिसराय।
4एकहुँ छिन नहिं तुम बिन बीतत, कहा करूँ अब हाय।
5प्रान निकसि जैहैं जब ऐहौ, तब का पैहौ आय।
6प्रान एक द्वै तनु “कृपालु” जिन, तिन कहँ विरह सताय॥
हिन्दी भावार्थ
(श्रीकिशोरी जी के वियोग में विरही श्यामसुन्दर का विलाप।) हाय! हाय!! किशोरी जी के बिना अब मैं क्या करूँ? मेरा तो प्राण निकला जा रहा है। हा राधे! हा प्रेमअगाधे!! तुम्हारे सिवा मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। तुम तो कभी भी हमारी आँखों से ओट नहीं होती थीं, अब मुझे भुलाकर कहाँ चली गयीं? हाय! हाय!! मैं क्या करूँ? तुम्हारे बिना एक क्षण र्भ चैन से नहीं बीतता। हे किशोरी जी! यदि मेरे प्राणों के निकल जाने पर तुम आओगी भी, तो तुम्हें क्या मिलेगा? "कृपालु आश्चर्यपूर्वक कहते हैं कि राधा-कृष्ण का शरीर दो है किन् प्राण एक ही है, उनको भी क्या परस्पर वियोग का अनुभव होता है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 640-641