मान-माधुरी · पद 22
छोड़ि मोहिं, राधे कितै गई।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhod̤i mohiṁ, rādhe kitai gaī?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1छोड़ि मोहिं, राधे कितै गई।
2बिनु कारन लिय ठान मान मम, जीवन प्रान-मई।
3ढूँढ़त-ढूँढ़त हारि थक्यों हौं, कुंज-लतन उनई।
4तुम बिनु मो कहँ सब जग सूनो, दीखत हाय दई।
5प्रान पयान करन चह पै इन, नैनन रोक लई।
6तुम बिनु अब “कृपालु” नहिं बीते, अब लौं हौं बितई॥
हिन्दी भावार्थ
( श्रीकिशोरी जी को ढूँढ़ते हुए प्रियतम श्यामसुन्दर का प्रत्येक कुंज में विलाप।) हा प्राणजीवनी राधे! तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गयीं। तुमने तो अकारण ही मान कर लिया। मैं प्रत्येक झुकी हुई लताओं की कुंजों में ढूँढ़-दूँढ़कर हार गया, किंतु अभी तक तुम नहीं मिलीं। तुम्हारे बिना, हा दई! मुझे सारा संसार शून्य सा प्रतीत होता है। मेरे प्राण बार-बार निकलकर तुम्हारे चरणों में आना चाहते हैं, किन्तु दर्शन की प्यासी मेरी आँखें रोक लेती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हे किशोरी जी! अब तक किसी प्रकार व्यतीत किया किन्तु तुम्हारे बिना अब किसी भी प्रकार समय नहीं बिताया जाता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 639-640