लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 21

जावो जी, न जल बिच आग लगावो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jāvo jī, na jala bicha āga lagāvo

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1जावो जी, न जल बिच आग लगावो।

2तुम्हरो पग, मग चलत थकत कत,

3बँटत न कछु किमि पुनि इत आवो।

4जा पद-रत, दृग झरत, हरत चित,

5धरत शीश तेहि कस बिसरावो।

6सुघर! अधर धर, मुरलि मधुर धुनि,

7सौतिन-गुन-गन गाइ रिझावो।

8कारी रेख खँचाय प्रेम-पट,

9बेदरदी! जनि जरिहिं जरावो।

10यह “कृपालु” वृषभानुलाड़ली,

11नहिं गँवारि जेहि पाठ पढ़ावो॥

हिन्दी भावार्थ

(मानिनी राधिका जी को मनाते हुए लालजी वे प्रति राधिका जी की कूटूक्ति।) हे प्रियतम! जाओ भी, जल में आग लगाने का प्रयत्न मः करो। तुम्हारे चरण हमारे पास तक आने में थक गये होंगे। में पास बार-बार क्यों आते हो, यहाँ क्या बँट रहा है? जिन चरणों में तुम्हारा अनन्य प्रेम है एवं जिन पर आँसू बहाते हो उन चन्द्रावलि के चरणों को कैसे भूल गये? हे प्रियतम अपनी मुरली की मधुर-ध्वनि में हमारी सौतों के गुण गा हुए, जाकर उन्हें ही प्रसन्न करो। प्रेम की अनन्यता में कलं लगाकर अब मुझं जली को जलाने क्यों आये? 'कृपालु' कहते हैं कि मैं वृषभानुनन्दिनी हूँ, कोई अबोध नहीं, जिसे तुः बातें बनाकर ठगने आये हो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 638-639