# लली बिनु, पल पल कलप लखात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0680-M16-K027
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 27
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 320–320

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लली बिनु, पल पल कलप लखात।  
<a id="line-2"></a>लखि प्राणाधिक-प्यारिहिं प्यारिहिं, प्रानहुँ तजि न सकात।  
<a id="line-3"></a>अब अइहैं, मिलिहैं, बतरैहैं, यह आशा नहिं जात।  
<a id="line-4"></a>सुन पिक-बैन ध्यान पिक-बैनिहिं, रहि रहि जिय घबरात।  
<a id="line-5"></a>लखत मृगन मृगनैनिहिं सुधि करि, अधिक अधिक अकुलात।  
<a id="line-6"></a>जियत न मरत “कृपालु” कहाँ लौं, कहिये दुख की बात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(लाडली जी के वियोग में लालजी का विलाप।) हाय! हाय!! मुझे किशोरी जी के बिना एक-एक क्षण कल्प के समान भारी लग रहा है। मैं किशोरी जी को प्राणों से भी अधिक प्यारी समझने के कारण प्राण नहीं छोड़ सकता। अभिप्राय यह है कि यदि प्राण छोड़ दूँगा तो प्राणाधिका किशोरी जी का दर्शन कैसे होगा? किशोरी जी अभी ही आयेंगी, मधुर मिलन का सुख प्रदान करेंगी एवं मधुर-मधुर बातें करेंगी, यह विश्वासपूर्ण आशा मेरा साथ नहीं छोड़ती। कोयल की मधुर बोली सुनकर कोयल के समान ही मधुर बोलने वाली किशोरी जी का स्मरण करते हुए मेरा हृदय और अधिक व्याकुल हो जाता है। हिरणों को देखकर हिरणों के समान नेत्रवाली किशोरी जी के बार-बार स्मरण से मैं और भी अधिक तड़पने लगता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि न तो मैं जीने ही में हूँ और न मरने ही में हूँ। अपने हृदय के दुःख की बात कहाँ तक कहूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 643-644

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
