लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 15

श्यामा-श्याम धाम-वृंदावन

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāmā-shyāma dhāma-vṛindāvana, sarasa prema-rasa vipina bahāvata

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्यामा-श्याम धाम-वृंदावन

2सरस प्रेम-रस विपिन बहावत।

3यामिनि शरद, संग ब्रज भामिनि,

4अभिरामिनि धुनि वेनु बजावत।

5जेहि सुनि, तजि अनहद धुनि ज्ञानी,

6जानि समाधि उपाधि भुलावत।

7दिव्य विलास रास-रस खेलत,

8लाल-लाड़ली नाचत गावत।

9उरझत उत कुंडल अलकनि, इत,

10बेसर वनमालहिं उरझावत।

11हिय हुलास कछु हास युगलवर,

12लाल युगल निज कर सुरझावत।

13पिय तनु लखि प्रतिबिंब प्रिया निज,

14जानि आन तिय मान बढ़ावत।

15उठि रिसाय चलि कटु सुभाय ललि,

16कर धरि चिबुक भृकुटि बल लावत।

17लै ललिता सखि अति सभीत पिय,

18सजल-नयन कर जोरि मनावत।

19फिरि बैठीं मुख मोरि कहति"उर,

20धरि कोउ तिय अब मो ढिग आवत"।

21बड़ असमंजस कहि न जाय कछु,

22ठाढ़ो गिरिधर दृग बरसावत।

23ललिता बुधि-बल लाल-ओढ़नी,

24ओढ़ि लाल दुति-देह दुरावत।

25लखि “कृपालु” तिरछे दृग राधे,

26हँसि निज प्रियतम कंठ लगावत॥

हिन्दी भावार्थ

प्रिया-प्रियतम वृन्दावन धाम में मधुर प्रेम रस की वर्षा कर रहे हैं। शरत् कालीन पूर्णिमा के चन्द्रमा से युक्त रात्रि है एवं करोड़ों गोपियों के साथ श्रीकृष्ण मधुर मुरली बजा रहे हैं। जिसे सुनकर जीवन्मुक्त ज्ञानी भी अपने अनहद-नाद एवं समाधि को उपाधि समझकर भूल जाते हैं। दिव्य रास-विलास का रस बरसाते हुए एवं गायनपूर्वक नृत्य करते-करते ही, श्रीकृष्ण के कुंडल किशोरी जी की वेणी में उलझ गये एवं किशोरी जी की बेसर ने वनमाला को उलझा अपने ही प्रतिबिम्ब को देखकर भोलेपन में दूसरी प्रेमिका मझकर मान कर लिया तथा तत्क्षण ही कुपित होकर वहाँ से ठकर चल दीं। कुछ दूर जाकर ठोढ़ी पर हाथ रखे हुए एवं ल खाती भौंहों को ताने हुए बैठ गयीं। रकर ललिता सखी को साथ लेकर मजाने के लिए गये। यतम प्यारीजी के सामने खड़े होकर आँसू भरे नेत्रों से हाथ गीड़कर अनुनय-विनयपूर्वक मजाने लगे, किन्तु प्रियतम के खाने आया है।'लालजी बड़े ही असमंजस में पड़कर खड़े बड़े आँसू बहाने लगे, कुछ भी कहते नहीं बना। बुद्धि कौशल के द्वारा प्रियतम ने लाल ओढ़नी ओढ़कर पने शरीर की कान्ति को ढक दिया। गल ओढ़नी ओढ़े हुए लाल को देखकर एवं पूर्व नायिका को देखकर किशोरी जी ने तिरछी आँखों से देखते हुए हँसकर गलजी को अपने गले से लगा लिया।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 630-632