मान-माधुरी · पद 16
सखी! सुनु, इक अनहोनी बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! sunu, ika anahonī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! सुनु, इक अनहोनी बात।
2हिलिमिलि कालि निकुंज मंजु बिच, रहे दोउ बतरात।
3औचक उर संकल्प दुहुँन के, भयो एक सँग रात।
4"आजु करौ हौ मान अकारन", हँसिन बात बढ़ि जात।
5दोउ किय मान, न दोउ मनायेउ, तब भइ दोउ रिस गात।
6कियो मान साँचेहिं तब दोउन, इमि ह्वै गई परभात।
7सखिन मनावत हारि गई पै, मरम न जानि सकात।
8पुनि दोउ संगहिं चले मनावन, आपुहिं आपु रिसात।
9लखि “कृपालु” द्वै गात चित्त इक, अचरज कछु न लखात॥
हिन्दी भावार्थ
(लाड़िली-लाल का अद्भुत मान एवं प्रणय।) एक सखी, दूसरी सखी से कहती है कि ए री सखी! एव अनोखी बात सुन। कल रात को प्रिया-प्रियतम निकुंज में बै हुए परस्पर घुल-मिलकर बातें कर रहे थे। अचानक ही दोन के हृदय में एक साथ संकल्प पैदा हुआ कि मैं आज बिन किसी कारण के ही मान करूँ। हँसी-हँसी में ही बात क बतङ्गड़ बन गया। दोनों ने ही अकारण मान कर लिया एः दोनों ही ने एक-दूसरे को नहीं मनाया जिसके परिणामस्वरू खीझकर दोनों ही कुपित हो गये। तत्पश्चात् दोनों ही ने वास्तविः मान ठान लिया। इस प्रकार एक दूसरे को न मजाने के कार इसी होड़ में सबेणा हो गया। ललिता आदि सखियाँ मनाते मनाते हार गयीं पर आज की इस विचित्र मान-माधुरी को नह समझ सकीं। प्रातः काल दोनों ही अपने-आप पर ही क्रो करते हुए एक साथ एक दूसरे को मजाने के लिए चले। 'कृपालु' कहते हैं कि जब इन दोनों का शरीरमात्र दो है किन्तु मन, बुः प्राण आदि एक ही हैं, तब एक साथ एक संकल्प होने में री सखी! आश्चर्य ही क्या है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 632-633