# सखी! सुनु, इक अनहोनी बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0669-M16-K016
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 16
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 314–315

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! सुनु, इक अनहोनी बात।  
<a id="line-2"></a>हिलिमिलि कालि निकुंज मंजु बिच, रहे दोउ बतरात।  
<a id="line-3"></a>औचक उर संकल्प दुहुँन के, भयो एक सँग रात।  
<a id="line-4"></a>"आजु करौ हौ मान अकारन", हँसिन बात बढ़ि जात।  
<a id="line-5"></a>दोउ किय मान, न दोउ मनायेउ, तब भइ दोउ रिस गात।  
<a id="line-6"></a>कियो मान साँचेहिं तब दोउन, इमि ह्वै गई परभात।  
<a id="line-7"></a>सखिन मनावत हारि गई पै, मरम न जानि सकात।  
<a id="line-8"></a>पुनि दोउ संगहिं चले मनावन, आपुहिं आपु रिसात।  
<a id="line-9"></a>लखि “कृपालु” द्वै गात चित्त इक, अचरज कछु न लखात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(लाड़िली-लाल का अद्भुत मान एवं प्रणय।) एक सखी, दूसरी सखी से कहती है कि ए री सखी! एव अनोखी बात सुन। कल रात को प्रिया-प्रियतम निकुंज में बै हुए परस्पर घुल-मिलकर बातें कर रहे थे। अचानक ही दोन के हृदय में एक साथ संकल्प पैदा हुआ कि मैं आज बिन किसी कारण के ही मान करूँ। हँसी-हँसी में ही बात क बतङ्गड़ बन गया। दोनों ने ही अकारण मान कर लिया एः दोनों ही ने एक-दूसरे को नहीं मनाया जिसके परिणामस्वरू खीझकर दोनों ही कुपित हो गये। तत्पश्चात् दोनों ही ने वास्तविः मान ठान लिया। इस प्रकार एक दूसरे को न मजाने के कार इसी होड़ में सबेणा हो गया। ललिता आदि सखियाँ मनाते मनाते हार गयीं पर आज की इस विचित्र मान-माधुरी को नह समझ सकीं। प्रातः काल दोनों ही अपने-आप पर ही क्रो करते हुए एक साथ एक दूसरे को मजाने के लिए चले। 'कृपालु' कहते हैं कि जब इन दोनों का शरीरमात्र दो है किन्तु मन, बुः प्राण आदि एक ही हैं, तब एक साथ एक संकल्प होने में री सखी! आश्चर्य ही क्या है?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 632-633

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
