मान-माधुरी · पद 14
अहो मम, प्रियतम सुंदर श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho mama, priyatama sundara shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो मम, प्रियतम सुंदर श्याम।
2हम जानति तुम मोहिं बिनु तलफत, पल-पल आठों याम।
3तुमहूँ यह जानत हम तुम बिनु, तलफत रह सब ठाम।
4तुम पुनि जानत, मान करति हम, लखि अटपट तव काम।
5पुनि क्यों अटपट काम करत इमि, जानि-जानि सुखधाम।
6तुमहूँ जान “कृपालु” तबहुँ कह, विरह प्रेम अभिराम॥
हिन्दी भावार्थ
मान भंग की अवस्था में किशोरी जी श्यामसुन्दर से कहती हैं कि हे मेरे प्रियतम श्यामसुन्दर! हम यह जानती हैं कि तुम मेरे बिना प्रतिक्षण तड़पते रहते हो। तुम भी यह जानते हो कि हम भी तुम्हारे बिना कहीं भी चैन नहीं पातीं। इसके अतिरिक्त तुम यह भी जानते हो कि हम तुम्हारे अटपटे कामों को ही देखकर मान करती हैं। फिर हे श्यामसुन्दर! तुम जान बूझकर यह अटपटे काम क्यों करते हो? 'कृपालु' ने कहा कि हे किशोरी जी! इस प्रश्न का उत्तर श्यामसुन्दर नहीं दे सकते किन्तु तुम जानती हो कि वियोग में प्रेम रस की वृद्धि होती है। यही प्रमुख रहस्य है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 629-630