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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 13

"माँग हम, स्वामिनि! इक वरदान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ‘māṁga hama, swāmini! ika varadāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1"माँग हम, स्वामिनि! इक वरदान।

2यह नँदनंदन दास तिहारो, देहु दया करि दान।

3सृष्टि करौं मुसकान-मात्र ते, प्रलय करौं भौं तान।

4निगमागम पुरान सब मो कहँ, कह समरथ भगवान।

5सोइ हौं माँगत भीख", लली कह,"माँगहु श्याम सुजान"।

6"माँगत अहौं इहै बस स्वामिनि, अब जनि करियो मान"।

7"करि हौं मान “कृपालु” लाल! जब, हो अपराध महान"॥

हिन्दी भावार्थ

मानभंग की अवस्था में श्यामसुन्दर किशोरी जी से कहते हैं कि हे किशोरी जी! हम तुमसे एक वरदान माँगते हैं। हम तुम्हारे दास हैं, अतएव दया करके उसे प्रदान करो। मैं मुस्कराने मात्र से सम्पूर्ण विश्व का निर्माण करता हूँ एवं भौंह के मरोड़ने मात्र से विश्व का प्रलय करता हूँ। वेद, शास्त्र पुराण सब मुझे सर्वसमर्थ भगवान् कहते हैं, वही मैं तुमसे भीख माँग रहा हूँ। किशोरी जी ने मुस्कराते हुए कहा, माँगो क्या माँगते हो? श्यामसुन्दर ने कहा-हे किशोरी जी! मैं यही वरदान माँगता हूँ कि अब तुम कभी भी मान न करना। 'कृपालु के शब्दों में किशोरी जी ने कहा कि विशेष अपराध देखने पर ही मान करूँगी। साधारण अपराध पर नहीं करूँगी।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 629