# "माँग हम, स्वामिनि! इक वरदान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0666-M16-K013
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 13
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 312–312

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>"माँग हम, स्वामिनि! इक वरदान।  
<a id="line-2"></a>यह नँदनंदन दास तिहारो, देहु दया करि दान।  
<a id="line-3"></a>सृष्टि करौं मुसकान-मात्र ते, प्रलय करौं भौं तान।  
<a id="line-4"></a>निगमागम पुरान सब मो कहँ, कह समरथ भगवान।  
<a id="line-5"></a>सोइ हौं माँगत भीख", लली कह,"माँगहु श्याम सुजान"।  
<a id="line-6"></a>"माँगत अहौं इहै बस स्वामिनि, अब जनि करियो मान"।  
<a id="line-7"></a>"करि हौं मान “कृपालु” लाल! जब, हो अपराध महान"॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मानभंग की अवस्था में श्यामसुन्दर किशोरी जी से कहते हैं कि हे किशोरी जी! हम तुमसे एक वरदान माँगते हैं। हम तुम्हारे दास हैं, अतएव दया करके उसे प्रदान करो। मैं मुस्कराने मात्र से सम्पूर्ण विश्व का निर्माण करता हूँ एवं भौंह के मरोड़ने मात्र से विश्व का प्रलय करता हूँ। वेद, शास्त्र पुराण सब मुझे सर्वसमर्थ भगवान् कहते हैं, वही मैं तुमसे भीख माँग रहा हूँ। किशोरी जी ने मुस्कराते हुए कहा, माँगो क्या माँगते हो? श्यामसुन्दर ने कहा-हे किशोरी जी! मैं यही वरदान माँगता हूँ कि अब तुम कभी भी मान न करना। 'कृपालु के शब्दों में किशोरी जी ने कहा कि विशेष अपराध देखने पर ही मान करूँगी। साधारण अपराध पर नहीं करूँगी।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 629

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
