मान-माधुरी · पद 12
सुनो मम, प्रियतम नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno mama, priyatama nandakumāra!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनो मम, प्रियतम नंदकुमार।
2तुम मम प्राणनाथ प्राणेश्वर, तुम मम प्राणाधार।
3तुम यह भलीभाँति हो जानत, तुम ही सों मम प्यार।
4हौं हूँ यदपि जान यह नीके, तुम सब जग भरतार।
5तदपि प्रेम बस मानत अपनोइ, सबै भाँति अधिकार।
6कह “कृपालु” यह ज्ञान जात बहि, प्रेम पयोधि मझार॥
हिन्दी भावार्थ
मानभंग की अवस्था में किशोरी जी श्यामसुन्दर से कहती हैं कि हे प्रियतम! तुम मेरे प्राणनाथ, प्राणेश्वर प्राणाधार हो। तुम यह भली- भाँति जानते हो कि हमारा प्यार एक मात्र तुम्हीं से है। यद्यपि मैं भी भली-भाँति यह जानती हूँ कि तुम समस्त संसार के प्रियतम हो फिर भी प्रेम-विभोर हो जाने के कारण मैं पूर्णाधिकार अपना ही मानने लगती हूँ। कृपालु' कहते हैं कि ज्ञान-सिद्धान्त प्रेम-रसधारा में वह जाया करता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 628