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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 11

सुनो मम, स्वामिनि भानुदुलार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno mama, swāmini bhānudulāra!

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुनो मम, स्वामिनि भानुदुलार।

2यह गोलोक नाहिं मानिनि! यह, माया को संसार।

3ह्याँ कोउ देखि सकत नहिं काउहिं, सुख संपति परिवार।

4लेति मान काहू सों सुनि कछु, नेकु न करति विचार।

5अपनेहुँ कानन सुनि सीता के, उर भ्रम भयो अपार।

6ताको फल “कृपालु” हरि रावण, लै गयो लंक मझार॥

हिन्दी भावार्थ

मानभंग की अवस्था में श्यामसुन्दर किशोरी जी से कहते हैं कि हे स्वामिनि जी! यह गोलोक नहीं है, यह माया का संसार है। यहाँ कोई किसी के परिवार की सुख सम्पत्ति नहीं देख सकता। किसी से कुछ सुनकर ही तुम उसे मान लेती हो, स्वयं कुछ भी विचार नहीं करतीं। कहाँ तक कहूँ, अपने ही कान से सुनकर जगदम्बिका सीता जी के हृदय में महान्। भ्रम उत्पन्न हो गया। 'कृपालु' के शब्दों में जिसका फल यह हुआ कि रावण सीता जी को हरकर अपनी लंकापुरी में ले गया।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 627-628