मान-माधुरी · पद 10
मानिनी, यह ऐसो संसार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī! yaha aiso sansāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मानिनी, यह ऐसो संसार।
2अहि मूषिक इव बिनु स्वारथ ही, नित कर पर अपकार।
3काउहिं दंपति सुख संपति लखि, खात जगत सब खार।
4बिनु इक बातहिं सात बनावत, कुटनिनि यह व्यापार।
5भोरिन कहँ बहुभाँति भुरावति, लखि न सकत तिन प्यार।
6सुनहु “कृपालु” कान आपुन अरु, आपुनि आँखि निहार॥
हिन्दी भावार्थ
मानभंग की अवस्था में स्वामिनी जी से श्यामसुन्दर कहते हैं कि स्वामिनि जी! यह माया का संसार ऐसा है कि इसमें बिना अपने मतलब के भी साँप एवं चूहे के समान लोग दूसरों का अहित किया करते हैं। किसी दम्पत्ति की सुख सम्पति देखकर संसार के लोग ईर्ष्या करते हैं। बिना एक बात के ही सात बातें बजाने वाले हैं। खास तौर से कुटनी स्त्रियों का तो व्यापार ही यही है। वे भोले-भाले दम्पति को सुखी नहीं देखना चाहतीं। उनमें कलह पैदा कर देने में ही उन्हें सुख मिलता है। 'कृपालु' कहते है कि इस संसार में प्रत्येक मनुष्य को अपने ही कान से सुनना चाहिये एवं अपनी ही आँखों से देखना चाहिये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 626-627