मान-माधुरी · पद 9
मानिनी, तू मानति नहिं बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī! tū mānati nahiṁ bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मानिनी, तू मानति नहिं बात।
2हमहूँ देखी निज नैनन सों, कालि यमुन तट जात।
3तू तो अपनी अष्ट सखिहुँ की, बातहुँ नहिं पतियात।
4तू जानति कितनो नटखट पिय, ऊधम ते न अघात।
5कालि लरन लागे बनरन ते, उनकी रही जमात।
6बनरन नखन प्रहार किये बहु, इनके श्यामल गात।
7पुनि भाजे लै मुरलि पीत पट, हरि रहि गये खिसियात।
8चुनरी यह “कृपालु” मैया की, ओढ़ि लई बलभ्रात॥
हिन्दी भावार्थ
मानिनी वृषभानुनन्दिनी से ललिता सखी कहती हैं कि हे किशोरी जी! तुम हमारी बात नहीं मानतीं। मैंने भी कल यमुना तट पर जाते हुए श्यामसुन्दर को अपनी आँखों से देखा है। तुम तो अपनी अष्ट-महासखियों की बात पर विश्वास नहीं करतीं। तुम यह तो जानती ही हो कि वह नटखट, ऊधम से नहीं अघाता। कल यमुना के किनारे बन्दरों से लड्ने लगा। वह अकेला था एवं बन्दरों का झुण्ड था। बन्दरों ने श्यामसुन्दर के शरीर में नखों से प्रहार किया एवं उनकी मुरली और पीताम्बर लेकर भाग गये। वे खिसियाते रह गये। 'कृपालु' के शब्दों में हे किशोरी जी!! यह चुनरी तो श्यामसुन्दर ने मैया की ओढ़ ली थी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 626