मान-माधुरी · पद 8
कहति का, ललिता बात बनाय?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahati kā, lalitā bāta banāya?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहति का, ललिता बात बनाय?।
2हम जानति तुम चोर-चोर दोउ, मौसियाउतहिं भाय।
3हम देखी इन नैनन ते पुनि, कत चह मोहिं भुराय।
4वाके नखन चिह्न प्रति अंगनि, मो कहँ पर्यो लखाय।
5देख्यो नाहिं पीत पट वाको, चुनरी उर लहराय।
6कहँ लौं कहौं “कृपालु” बात सखि! मुरलिहुँ तहँ बिसराय॥
हिन्दी भावार्थ
मानिनी वृषभानुनन्दिनी ललिता सखी से कहती हैं कि अरी ललिते! तू मुझसे क्यों बात बना रही है। हम भली भाँति जानती हैं कि तुम दोनों "चोर-चोर मौसेरे भाई'हो। मैंने अपनी आँखों से देखा है फिर भी तू मुझे भुलावा देना चाहती है। उसके प्रत्येक अंग में मैंने अपनी आँखों से नाखूनों के चिह्न देखे हैं। पीताम्बर के स्थान पर चुनरी लटका कर आया था। अरी सखि! कहाँ तक कहूँ, 'कृपालु' के शब्दों में मुरली भी चन्द्रावलि के घर में छोड़ आया था।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 625