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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 7

मानिनी, बात हमारी मान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī! bāta hamārī māna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मानिनी, बात हमारी मान।

2बिनु समुझे बूझे ही नित प्रति, लेति मान तुम ठान।

3मोहू ते पूछति नहिं टुक यह, कौन तिहारी बान।

4चंद्रावलि तो कालि गई रहि, हमरेहिं भवन सुजान।

5भई बेर तब सोइ गई तहँ, नहिं आयो तहँ कान्ह।

6सो “कृपालु” नित छली जाति जो, सुनति आन के कान॥

हिन्दी भावार्थ

कि हे स्वामिनी जी! तुम हमारी बात पर विश्वास करो। तुम सदा बिना समझे-बूझे ही मान ठान लेती हो। यह तुम्हारी कौन सी आदत है। जरा सा मुझसे भी नहीं पूछ लेतीं। चन्द्रावलि तो कल रात मेरे घर गयी थी। वहाँ उसे देर हो गयी तब वहीं सो गयी। वहाँ श्यामसुन्दर नहीं आये थे। 'कृपालु' कहते हैं कि उसको सभी लोग ठग लेते हैं जो दूसरे के कान से सुनता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 624-625