मान-माधुरी · पद 6
बताऊँ, तो कहँ सखि! का बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: batāūṁ, to kahaṁ sakhi! kā bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बताऊँ, तो कहँ सखि! का बात।
2सुनहु सखी! ललिता, वाकी कछु, बात कही नहिं जात।
3कहत मधुर बोलनि मो ते अस,"तुम ही सों मम नात"।
4पै विहरत चंद्रावलि घर वह, नेकहुँ नाहिं लजात।
5कह्यो कालि अइहौं अध रातिहिं, करिहौं तव मनभात।
6नहिं आयो “कृपालु” परखत रहि, तलफत बीती रात॥
हिन्दी भावार्थ
मानिनी वृषभानुनन्दिनी ललिता सखी से कहती हैं कि अरी सखि! मैं तुझसे क्या बात बताऊँ। उस छलिया की कुछ बात कहने योग्य ही नहीं है। वह बड़े मधुर बोल से मुझसे कहता है कि मेरा प्रेम एकमात्र तुम्हीं से है किन्तु चन्द्रावलि के घर में नित्य विहार करने जाया करता है। उसको थोड़ी भी लज्जा नहीं है। कल उसने मुझसे कहा कि मैं अद्धरात्रि में आऊँगा एवं तुम्हारा मनभाया करूँगा। 'कृपालु' के शब्दों में किशोरी जी कहती हैं कि फिर भी वह नहीं आया, मैं परखती रही एवं पूरी रात तड़पती रही।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 624