लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 5

मानिनी, कहु कछु तो का बात?।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī! kahu, kachhu to kā bāta?

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मानिनी, कहु कछु तो का बात?।

2ललिता कहति स्वामिनी जू सों, मन ही मन डरपात।

3हौं मानति वे बड़े बुरे हैं, निगुरे श्यामल-गात।

4पै जो कह, हम ओर ढुरे उन, यह अचरज दरसात।

5हम तो तुमहिं दुखी लखि आई, मम वासों का नात।

6तुमहिं “कृपालु” लली! हम नित चह, देखन मृदु मुसकात॥

हिन्दी भावार्थ

मानिनी वृषभानुनन्दिनी से ललिता सखी डरती हुई कहती हैं कि हे स्वामिनी जी! कुछ कहो तो, क्या बात है? मैं मानती हूँ कि निगोड़े श्यामसुन्दर बहुत ही बुरे हैं किन्तु तुम जो कहती हो कि हम उनके पक्ष में हैं, यह बड़े आश्चर्य की बात है। मैं तो तुम्हें दुःखी देखकर आई हूँ। उनसे मेरा क्या सम्बन्ध है और यदि कुछ सम्बन्ध है भी, तो वह तुम्हारे ही नाते हैं। कृपालु' के शब्दों में ललिता कहती हैं कि हे स्वामिनी जी! हम तुम्हें प्रतिक्षण मुस्कराते हुए देखना चाहती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 623