लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 4

सखी तू, उनहिन ओर ढुरे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī tū, unahina ora ḍhure

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी तू, उनहिन ओर ढुरे।

2मानिनि कहति, सुनो सखि! ललिता, वे सब भाँति बुरे।

3हम उन ते नहिं बात करन चह, वे ऐसे निगुरे।

4ऐसे घाव किये उनने जो, कैसेहुँ नाहिं पुरे।

5तोरि दियो तृण सम सब नातो, अब नहिं नात जुरे।

6सुनत “कृपालु” ओट ते हरि उर, लागत बैन छुरे॥

हिन्दी भावार्थ

आ मानिनी वृषभानुनन्दिनी ललिता सखी से पूछती हैं कि अरी सखि! तू तो उन्हीं की ओर होकर बात करती है। अरी ललिता। वे सब प्रकार से बुरे हैं। अब मैं उन निगोड़े श्यामसुन्दर से बात नहीं करना चाहती। उन्होंने हमारे हृदय में ऐसा घाव किया है कि जो किसी भी प्रकार से अच्छा नहीं हो सकता। अब हमारा उनका तो सम्बन्ध नहीं रहा। हमने अपना सम्बन्ध तृण के समान तोड़ दिया है। 'कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर ओट से यह सब सुन रहे हैं। किशोरी जी के कटुवचन उनके हृदय में छुरे के समान लग रहे हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 622-623