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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 3

मानिनिहिं, सनमुख जात डरे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninihiṁ, sanamukha jāta ḍare

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मानिनिहिं, सनमुख जात डरे।

2गये मनावन हरि ललिता के, पाछे भये खरे।

3ललितहिं लली लखीं तेहि दृग जेहि, शंकर, प्रलय करे।

4पुनि इमि कर"तू इत कत आई?, कौन काम बिगरे"।

5ललिता कह"स्वामिनि! तुम बिनु मोहिं, इक पल कल न परे"।

6उत “कृपालु” प्रीतम तो तुम बिनु, साँचुहिं जात मरे"॥

हिन्दी भावार्थ

मानिनी वृषभानुनन्दिनी के सामने श्यामसुन्दर जाने में डर रहे हैं। मजाने तो गये किन्तु ललिता सखी के पीछे चुपचाप खड़े रहे। ललिता सखी को किशोरी जी ने इस दृष्टि से देखा, जिस दृष्टि से भगवान् शंकर सृष्टि का प्रलय करते हैं। पश्चात् किशोरी जी ने कहा कि तू यहाँ क्यों आयी है? तेरा कौन सा काम बिगड़ रहा था? ललिता सखी ने उत्तर दिया कि हे स्वामिनी जी तुम्हारे बिना हमें एक क्षण को भी चैन नहीं है। कृपालु' के शब्दों में उधर श्यामसुन्दर तो तुम्हारे बिना सममुच ही मरे जा रहे हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 622