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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 2

मानिनी, डर हरि दूर खरे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī, ḍara hari dūra khare

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मानिनी, डर हरि दूर खरे।

2जाके डरहिं डरहुँ डरपत सो, मानिनि डरहिं डरे।

3भृकुटिन लखत, निकट फटकन को, साहस नाहिं परे।

4पुलक, स्वेद तनु थर थर काँपत, नैननि नीर ढरे।

5कहन चहत नहिं कहत, लखन चह, लखत न, लखत तरे।

6लिखत “कृपालु” नखन पग भू पर, उर नहिं धीर धरे॥

हिन्दी भावार्थ

मानिनी वृषभानुनन्दिनी के डर के मारे श्यामसुन्दर दूर ही खड़े हैं। जिसके भय से साक्षात् भय भी भयभीत होता है, देखो तो, वही मानिनी वृषभानुनन्दिनी के डर से डर रहा है। श्यामसुन्दर चुपके से एकमात्र किशोरी जी की भौंहों को देखते हैं। उनके पास जाने का साहस नहीं होता। श्यामसुन्दर के शरीर में डर के मारे रोमांच हो रहा है। पसीना निकल रहा है एवं उनका शरीर थर-थर काँप रहा है, उनकी आँखों से आँसू बह रहे हैं, वे कुछ कहना तो चाहते हैं किन्तु कहने की हिम्मत नहीं पड़ती। निर्भयतापूर्वक देखना चाहते हैं किन्तु डर के मारे देख नहीं सकते, केवल नीचे की ओर देखते हैं। ''कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर पैर के नाखून से पृथ्वी पर कुछ लिखते हैं एवं अत्यन्त अधीर हो रहे हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 621