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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 1

मानिनी, छिन-छिन मान करे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī, chhina-chhina māna kare

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मानिनी, छिन-छिन मान करे।

2इक कर नखन लिखति कछु भूपर, इक कर, चिबुक धरे।

3भृकुटी कुटिल कमान तनी जनु, नागिनि फन निकरे।

4अति रिस भरी, लखति इत उत चहुँ, लखि लखि सखिहुँ डरे।

5बिखरी लट दुलरी, तिलरी, पट, भूषन अवनि परे।

6गिरिधर दोउ “कृपालु” कर जोरे, काँपत डरनि खरे॥

हिन्दी भावार्थ

वृषभानुनन्दिनी राधिका जी क्षण-क्षण में मान करती हैं। उनके मान की झाँकी दर्शनीय है। वे एक हाथ तो ठोढ़ी पर रखे हुए हैं एवं एक हाथ के नख से पृथ्वी के ऊपर कुछ लिख रही हैं। धनुष के समान टेढ़ी भौंहें ऐसी तनी हुई हैं जैसे किसी नागिन के फन निकले हों। अत्यन्त क्रोध में भरी हुई किशोरी जी इधर-उधर चारों ओर देखती जा रही हैं। सखियाँ तक उनके पास जाने का साहस नहीं करतीं। उनके बाल बिखरे हुए हैं। दुलरी, तिलरी आदि हार एवं अन्यान्य वस्त्र आभूषणादि पृथ्वी पर पड़े हुए हैं। "कृपालु कहते हैं कि श्यामसुन्दर दोनों हाथ जोड़े हुए डर के मारे काँपते हुए खड़े हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 620-621