मिलन-माधुरी · पद 70
हाय सखी! दृगन मिलाय मन लै गयो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya sakhi! dṛigana milāya mana lai gayo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय सखी! दृगन मिलाय मन लै गयो।
2हौं भोरी सखि! वयस किशोरी,
3हाय सखि! ना जाने का जादू कै गयो।
4भई बावरी तलफत डोलूँ,
5हाय सखि! दुसह-पीर उर दै गयो।
6मृदु मुसकाय मधुर धुनि"प्यारी",
7हाय सखि! कहि के न जाने कितै गयो।
8कहा करूँ कित जाउँ पिया बिनु,
9हाय सखि! पलक, कलप सम ह्वै गयो।
10अब “कृपालु” केहि भाँति सरेगी,
11हाय सखि! विष-बेलरि उर बै गयो॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन एवं उसका अपनी अन्तरंग सखी से कहना।) हाय सखी! आज तो प्यारे श्यामसुन्दर ने मेरी आँखों को मिलाकर मेरा मन हर लिया। मैं किशोर अवस्था वाली अत्यन्त ही भोली-भाली थी। अरी सखी! उसने पता नहीं मेरे ऊपर क्या जादू कर दिया है? अब मैं उसके लिए दीवानी सी हुई इधर-उधर तड्पती डोल रही हूँ। अरी सखि! उसने मुझे असह्य विरह-वेदना दे दी है। अब मैं उसके बिना कहाँ जाऊँ, क्या करूँ? अरी सखी! अब तो मेरा एक क्षण भी कल्प के समान भारी हो गया है। अरी सखी! अब क्या होगा? 'कृपालु' कहते हैं कि अब तू कैसे जीवित रहेगी? उस छलिया ने तो तेरे हृदय में विरह की विष-बेल बो दी है। अभिप्राय यह है कि अभी तो वह विरह अंकुर रूप ही है, किन्तु जब वह वृक्ष बनेगा तब कैसे बीतेगी?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 618