# मानिनी, तू मानति नहिं बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0662-M16-K009
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 9
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 310–311

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मानिनी, तू मानति नहिं बात।  
<a id="line-2"></a>हमहूँ देखी निज नैनन सों, कालि यमुन तट जात।  
<a id="line-3"></a>तू तो अपनी अष्ट सखिहुँ की, बातहुँ नहिं पतियात।  
<a id="line-4"></a>तू जानति कितनो नटखट पिय, ऊधम ते न अघात।  
<a id="line-5"></a>कालि लरन लागे बनरन ते, उनकी रही जमात।  
<a id="line-6"></a>बनरन नखन प्रहार किये बहु, इनके श्यामल गात।  
<a id="line-7"></a>पुनि भाजे लै मुरलि पीत पट, हरि रहि गये खिसियात।  
<a id="line-8"></a>चुनरी यह “कृपालु” मैया की, ओढ़ि लई बलभ्रात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मानिनी वृषभानुनन्दिनी से ललिता सखी कहती हैं कि हे किशोरी जी! तुम हमारी बात नहीं मानतीं। मैंने भी कल यमुना तट पर जाते हुए श्यामसुन्दर को अपनी आँखों से देखा है। तुम तो अपनी अष्ट-महासखियों की बात पर विश्वास नहीं करतीं। तुम यह तो जानती ही हो कि वह नटखट, ऊधम से नहीं अघाता। कल यमुना के किनारे बन्दरों से लड्ने लगा। वह अकेला था एवं बन्दरों का झुण्ड था। बन्दरों ने श्यामसुन्दर के शरीर में नखों से प्रहार किया एवं उनकी मुरली और पीताम्बर लेकर भाग गये। वे खिसियाते रह गये। 'कृपालु' के शब्दों में हे किशोरी जी!! यह चुनरी तो श्यामसुन्दर ने मैया की ओढ़ ली थी।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 626

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
