# श्यामा-श्याम धाम-वृंदावन

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0668-M16-K015
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 15
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 313–314

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>श्यामा-श्याम धाम-वृंदावन  
<a id="line-2"></a>सरस प्रेम-रस विपिन बहावत।  
<a id="line-3"></a>यामिनि शरद, संग ब्रज भामिनि,  
<a id="line-4"></a>अभिरामिनि धुनि वेनु बजावत।  
<a id="line-5"></a>जेहि सुनि, तजि अनहद धुनि ज्ञानी,  
<a id="line-6"></a>जानि समाधि उपाधि भुलावत।  
<a id="line-7"></a>दिव्य विलास रास-रस खेलत,  
<a id="line-8"></a>लाल-लाड़ली नाचत गावत।  
<a id="line-9"></a>उरझत उत कुंडल अलकनि, इत,  
<a id="line-10"></a>बेसर वनमालहिं उरझावत।  
<a id="line-11"></a>हिय हुलास कछु हास युगलवर,  
<a id="line-12"></a>लाल युगल निज कर सुरझावत।  
<a id="line-13"></a>पिय तनु लखि प्रतिबिंब प्रिया निज,  
<a id="line-14"></a>जानि आन तिय मान बढ़ावत।  
<a id="line-15"></a>उठि रिसाय चलि कटु सुभाय ललि,  
<a id="line-16"></a>कर धरि चिबुक भृकुटि बल लावत।  
<a id="line-17"></a>लै ललिता सखि अति सभीत पिय,  
<a id="line-18"></a>सजल-नयन कर जोरि मनावत।  
<a id="line-19"></a>फिरि बैठीं मुख मोरि कहति"उर,  
<a id="line-20"></a>धरि कोउ तिय अब मो ढिग आवत"।  
<a id="line-21"></a>बड़ असमंजस कहि न जाय कछु,  
<a id="line-22"></a>ठाढ़ो गिरिधर दृग बरसावत।  
<a id="line-23"></a>ललिता बुधि-बल लाल-ओढ़नी,  
<a id="line-24"></a>ओढ़ि लाल दुति-देह दुरावत।  
<a id="line-25"></a>लखि “कृपालु” तिरछे दृग राधे,  
<a id="line-26"></a>हँसि निज प्रियतम कंठ लगावत॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्रिया-प्रियतम वृन्दावन धाम में मधुर प्रेम रस की वर्षा कर रहे हैं। शरत् कालीन पूर्णिमा के चन्द्रमा से युक्त रात्रि है एवं करोड़ों गोपियों के साथ श्रीकृष्ण मधुर मुरली बजा रहे हैं। जिसे सुनकर जीवन्मुक्त ज्ञानी भी अपने अनहद-नाद एवं समाधि को उपाधि समझकर भूल जाते हैं। दिव्य रास-विलास का रस बरसाते हुए एवं गायनपूर्वक नृत्य करते-करते ही, श्रीकृष्ण के कुंडल किशोरी जी की वेणी में उलझ गये एवं किशोरी जी की बेसर ने वनमाला को उलझा अपने ही प्रतिबिम्ब को देखकर भोलेपन में दूसरी प्रेमिका मझकर मान कर लिया तथा तत्क्षण ही कुपित होकर वहाँ से ठकर चल दीं। कुछ दूर जाकर ठोढ़ी पर हाथ रखे हुए एवं ल खाती भौंहों को ताने हुए बैठ गयीं। रकर ललिता सखी को साथ लेकर मजाने के लिए गये। यतम प्यारीजी के सामने खड़े होकर आँसू भरे नेत्रों से हाथ गीड़कर अनुनय-विनयपूर्वक मजाने लगे, किन्तु प्रियतम के खाने आया है।'लालजी बड़े ही असमंजस में पड़कर खड़े बड़े आँसू बहाने लगे, कुछ भी कहते नहीं बना। बुद्धि कौशल के द्वारा प्रियतम ने लाल ओढ़नी ओढ़कर पने शरीर की कान्ति को ढक दिया। गल ओढ़नी ओढ़े हुए लाल को देखकर एवं पूर्व नायिका को देखकर किशोरी जी ने तिरछी आँखों से देखते हुए हँसकर गलजी को अपने गले से लगा लिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 630-632

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
