मिलन-माधुरी · पद 68
हर्यो सखि, मो मन मोहन-लाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: haryo sakhi! mo mana mohana-lāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हर्यो सखि, मो मन मोहन-लाल।
2हौं यमुना-तट गई भरन घट, पनघट मिल्यो गुपाल।
3सुघर सलोना, नंदडुठोना, टोना किय ततकाल।
4परी ठगोरी, रति-रस बोरी, भोरी हौं ब्रजबाल।
5नैन निगोरे, अति बरजोरे, जोरे नात रसाल।
6अब मोहिं पल पल, परत न कहुँ कल, जलभर नैन विशाल।
7अनजाने “कृपालु” मनमाने, ठाने हठ अस हाल॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन एवं उसका एक सखी से कहना।) अरी सखी! आज तो मनमोहन ने मेरा मन हर लिया है। मैं यमुना के किनारे जल भरने गई थी कि अचानक पनघट पर वह छलिया मिल गया। अत्यन्त ही सुन्दर उस नंद के ढोटा ने तक्षण ही कुछ टोना सा कर दिया। मैं भोली-भाली गोपी हा ठगाई में आकर, उसके प्रेम में विभोर हो गई। इन हठीले नेत्रों ने भी हठपूर्वक उससे सदा के लिए परम मधुर नाता जोड़ लिया। अब उसके वियोग में एक-एक क्षण मुझे दुःखदाई हो रहा है एवं मेरी आँखों में बार-बार आँसू भरे जा रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! जो भी बिना समझे-बूझे मनमाने ढंग से ऐसा चांचल्यपूर्ण हठ कर डालती है, उसकी ऐसी ही दशा होती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 616-617