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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 67

हरि कै गयो बंटाढार रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hari kai gayo baṇṭāḍhāra re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हरि कै गयो बंटाढार रे।

2इकली कालि कूल-कालिंदी लखत रही जलधार रे।

3तहँ आयो घूमत अति झूमत, नटखट-नंदकुमार रे।

4देखत ही देखत देखत ही, द्वै दृग ह्वै गये चार रे।

5कह्यो मोहिं प्यारी नथवारी!, मोते करि ले प्यार रे।

6इकटक लागि “कृपालु” टकटकी, सुधि बुधि देह बिसार रे॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है कि श्यामसुन्दर ने गज़ब कर दिया। मैं कल अकेली ही यमुना के किनारे जलधारा देख रही थी। इतने में ही वहाँ पर नन्दकुमार झूमती हुई चाल से, घूमते हुए आ गये। मेरे देखते ही देखते दो आँखें चार हो गयीं। उन्होंने मुझसे कहा- ''ओ नथवारी प्यारी! मुझसे थोड़ा सा प्यार कर ले''। 'कृपालु' के शब्दों में, सखी कहती है कि मुझसे तो रहा ही नहीं गया। मुझे अपनी ही सुध-बुध नहीं थी एकमात्र टकटकी लगाकर एकटक देखती ही रही।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 615-616