मिलन-माधुरी · पद 65
सो, टोना सों कछु कै गयो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: so, ṭonā soṁ kachhu kai gayo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सो, टोना सों कछु कै गयो।
2कालि रही मैं न्हात अचानक, पिय यमुना-तट पै गयो।
3मृदु मुसकाय नैन सैनन ही, मनमोहन मन लै गयो।
4लै गयो जो सो लै गयो, सो उर, मधुर-वेदना दै गयो।
5छिन-छिन बाढ़ति मधुर-वेदना, विरह बीज उर बै गयो।
6अब “कृपालु” का पछिताने जो, होना था सो ह्वै गयो॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी कहती है कि श्यामसुन्दर ने मेरे ऊपर टोना सा कर दिया। कल मैं यमुना में नहा रही थी। अचानक वहीं पर श्यामसुन्दर आ गये। उन्होंने अपनी मधुर मुस्कान एवं नत्रों के कटाक्ष से ही मेरा मन हर लिया। मन हर लिया सो हर लिया कोई बात नहीं, किन्तु मेरे हृदय में विरह की आग का नीज भी बो दिया। अब यह विरह बीज की मधुर वेदना ह बढ़ती जा रही है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि अब पछताने से क्या होता है, जो होना था सो हो गया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 614-615