मिलन-माधुरी · पद 63
सखी! सुनु, वो मेरे मन भाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! sunu, vo mere mana bhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! सुनु, वो मेरे मन भाय।
2मोते कहा दुरावति सखि! टुक,"वो"को नाम बताय।
3वो को नाउँ लेउँ सखि! कैसे? जेहि हौं पिया बनाय।
4जनि बताउ वो नाम सखी! पै, वो गामहिं बतराय।
5वो के गाम-नाम महँ वो के, बाप-नाम सखि आय।
6कह “कृपालु” हौं जानि गई सखि! वो रसिया बलभाय॥
हिन्दी भावार्थ
(एक ब्रजांगना का ब्रजेन्द्रनन्दन से प्रथम मधुर मिलन एवं उसका अपनी अन्तरंग सखी से प्रकट करना- ) अरी सखि! वो मेरे मन को भा गये। क्यों छिपाती है, जरा अपने 'वो का नाम तो बता''। उत्तर दिया अरी सखि! है-फिर मैं वो का नाम कैसे लूँ? वो का नाम मत बता, वो का गाँव ही बता दे। दिया-"'वो के गाँव का नाम कैसे लूँ? तो वो के बाप का नाम आता है। सखि! मैं तो जान गई इसका वो', रसिया नन्दकुमार है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 612-613