मिलन-माधुरी · पद 62
सखी! सुनु, प्रथम मिलन की बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! sunu, prathama milana kī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! सुनु, प्रथम मिलन की बात।
2लखी कालि यमुना तट नटखट, मंद मंद मुसकात।
3रूप अनूप नंदनंदन को, सुंदर-श्यामल गात।
4बाँके नैन, सैन अति-बाँके, मधु बोलनि बतरात।
5जनि पूछहु सखि! चाल लाल की, लखि मराल सकुचात।
6लखि “कृपालु” सो बाँकी-झाँकी, पुनि पुनि मन ललचात॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से अपने एवं श्यामसुन्दर के मधुर-मिलन सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर देती हुई कहती है कि अरी सखी! उनके प्रथम मधुर मिलन की बात सुन। मैंने कल यमुना के किनारे उन नटखट को मन्द-मन्द मुस्कराते हुए देखा। उनका रूप अनिर्वचनीय था। उनके शरीर का रंग श्याम वर्ण का था। उनके नेत्र एवं कटाक्ष अत्यन्त ही मधुर थे। वे अत्यन्त मधुर वाणी से बातें करते थे। अरी सखि! उनकी चाल का हाल तो बिना कहे ही अच्छा है, हंस भी लज्जित होता है। 'कृपालु' के शब्दों में उनकी मनोहर झाँकी की प्रमुख विलक्षणता यह है कि उनको जितनी बार भी देखो तृप्ति नहीं होती।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 612