मिलन-माधुरी · पद 61
सखी! सुनु, एक दिना की बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! sunu, eka dinā kī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! सुनु, एक दिना की बात।
2न्हात रही तट तरणि-तनूजा, आयो श्यामल-गात।
3जो सुख भयो लखत सखि अँखियन, सो मुख कहि नहिं जात।
4"तोरी मोरी जोरी"इमि कहि, चल्यो मंद मुसकात।
5हौं हूँ मंद सुरन सों इमि कह,"श्याम गौर कस नात"।
6"अस क्योँ कही, “कृपालु” सोचि योँ, अब मन महँ पछितात॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है अरी में ही श्यामसुन्दर आ गये। उनके देखते ही आँखों को जो अनिर्वचनीय सुख मिला, उसका मुख से वर्णन नहीं हो सकता। वे 'तुम्हारी हमारी जोड़ी है'ऐसा कहकर मन्द-मन्द मुस्कराते हुए चल दिये। मैंने भी धीरे से कहा कि तुम काले हो, मैं गोरी हूँ, ऐसा भी कहीं सम्बन्ध हुआ है। 'कृपालु' के शब्दों में हो कहती है कि अब मैं यह सोचकर मन ही मन पछता रही हूँ कि मैंने ऐसा क्यों कह दिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 611-612