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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 60

सखी! मोहिं, नैनन-सैन सिखाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! mohiṁ, nainana-saina sikhāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी! मोहिं, नैनन-सैन सिखाय।

2सिखन चहति कत नैन-सैन सखि!, का कहुँ चहति चलाय।

3"कालि यमुन-तट गई भरन-घट, झट आयो बलभाय।

4नैन-सैन अस तकि उर मार्यो, गिरी धरणि कहि"हाय"।

5जो दे मोहिं सिखाय सखी! सो, जाय दाउँ लउँ वाय"।

6कह “कृपालु” यह नाहिं सिखन की, बात और ही आय॥

हिन्दी भावार्थ

(श्याम प्रेम-रस-परिप्लुत सखी की अपनी अन्तरंग सखी से नितान्त भोलेपन की उक्ति) अरी सखि! मुझे कटाक्षपात करना सिखा दे। सखी ने पूछा अरी सखि! तू कटाक्षपात क्यों सीखना चाहती है? म किसी पर प्रहार करने का विचार है?''सखी ने उत्तर दिया-''अरी सखि! कल मैं यमुना तट पर पानी-भरने गई थी, वहीं झटपट नटखट ने आकर मेरी ओर ऐसा कटाक्षपात किया कि मैं, 'हाय'! कह कर, मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। यदि तू मुझे कटाक्षपात सिखा दे तो मैं भी उस नटखट पर ऐसा कटाक्षपात करूँ कि वह भी मूर्च्छित होकर गिर पड़े ''। इतने में "कृपालु 'ने कहा-अरी सखि! दिव्य प्रेम-हीन आँख मटकाने मात्र से मूर्छा नहीं आ सकती। यह तो रसिकों के जगत् की बात है, सीखने-सिखाने की नहीं है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 610-611