मिलन-माधुरी · पद 59
सखी! मोहिं, डसि गयो श्याम-भुजंग।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! mohiṁ, ḍasi gayo shyāma-bhujaṅga
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! मोहिं, डसि गयो श्याम-भुजंग।
2कालि आलि! कालिंदी तट हौं, देखत रही तरंग।
3कोटि अनंग अंग-प्रति वारत, आयो ललित-त्रिभंग।
4हाय! हाय! कहि गिर्यो धरणि पर, नहिं जानी छल-ढंग।
5हौं ढिग गई लखी तब वाने, लंपट सोँ प्रति-अंग।
6कर परस्यो कहि"प्यारी"हौं हूँ,"प्यारे"कहि इक संग।
7अब “कृपालु” तनु विष बगरावति, सोइ धुनि श्यामल-रंग॥
हिन्दी भावार्थ
(एक जीवात्मा का परमात्मा से प्रथम मिलन एवं उसका अन्तरंग सखि से व्यक्त करना) क सखि! मुझे श्यामसुन्दर-रूपी काले सर्प ने डस लिया। मैं कल यमुना के किनारे खड़ी होकर यमुना को तरंगें देख रही थी, अचानक ही अनन्त कोटि-कन्दर्प-लावण्य युक्त तीन स्थानों से टेढ़ा वह नटखट वहीं आ गया, एवं 'हाय! हाय'! करके सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा। मैं उसके छल-अभिनय को न समझ सकी। तुरन्त ही दौड़कर वहाँ गई एवं अत्यन्त सहानुभूति को दृष्टि से देखने लगी। किन्तु उसने मेरे शरीर के प्रमुख अंगों पर लम्पट पुरुष की भाँति दृष्टिपात किया। मैंने प्रेमरस विभोर होकर अचेतनावस्था में उसके हाथ का स्पर्श करते हुये 'प्यारे! ऐसा कहा। उसी समय मेरे साथ ही उसने भी मेरे हाथ का स्पर्श करते हुए, "प्यारी'ऐसा कहा। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि अब श्यामसुन्दर की वही 'प्यारी'ध्वनि सम्पूर्ण शरीर में विरह का विष फैला रही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 609-610