मिलन-माधुरी · पद 58
सखी! मैं, ह्वै गइ काउ कि आज।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! maiṁ, hvai gai kāu ki āja
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! मैं, ह्वै गइ काउ कि आज।
2वे मेरे मैं उनकी, जग ते, कहा हमारो काज।
3माँगत रह्योँ भीख सब दिन ते, बंध्यो आज सरताज।
4जेहि विधि बढ़ै प्रीति छिन-छिन सोइ, सजिहौं, अब सब साज।
5इमि कहि बार बार भइ बावरि, नाचति नेकु न लाज।
6हम “कृपालु” , जानी, नहिं छानी, मोते सो ब्रजराज॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम-मिलन एवं उसका एक सखी से कहना) अरी सखी! मैं तो आज किसी की हो गई। वह हमारा हो गया, मैं उसकी हो गई। अब मुझे संसार से कुछ भी मतलब नहीं रहा। अरी सखी! अनादिकाल से अनन्तानन्त जन्म लेकर, अनन्तानन्त जीवों से जिस विशुद्ध प्रेम की भीख माँगा करती थी, वह विशुद्ध प्रेम आज मिल गया एवं आज मुझ भिखारिन के सिर पर साम्राज्ञी का (राजरानी का) मुकुट बँध गया। अब मैं वही कार्य करूँगी जिससे प्रियतम प्रसन्न हों एवं उनसे हमारा प्रतिक्षण प्रेम बढ़े। अपनी सखी से इस प्रकार—'मैं किसी की हो गई', 'मैं किसी की हो गई', बार-बार कहकर वह दीवानी-सी होकर नाचने लगी। उसने लोक-लाज की बिल्कुल परवाह न की। उसकी ऐसी दशा देखकर 'कृपालु' ने कहा कि तुम जिसकी हो गई हो मैं उसे जान गई, मुझसे तुम छिपा नहीं सकती, वह आनंदकंद श्रीकृष्णचंद हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 608-609